"क्यूँ मुहँ लटकाए खड़े हो भई?"
"कोई अपना गया है... नाचूं उसके जाने की खुशी में?
ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी से लड़ते-लड़ते कमज़ोर पड़ गया था वो...
आखिरकार ज़िन्दगी ने क्या नहीं फेंक के मारा उसे?
ऐसा लगा कि कोई एहसान रह गया था ज़िन्दगी का उसके सर
जिसे चुकाने में आना-कानी कर बैठा बेचारा
या फिर ऐसा तो नहीं था, कि किसी का कुछ बिगाडा हो
और ऐन उसी वक्त ख़ुदा उठा हो अपनी लम्बी नींद से
और नज़र आ गया हो उसे वो शख्स
अब ख़ुदा पर तो कोई क्या ऊँगली उठाये
लेकिन नानी हमेशा कहती थीं
कि अगर सच्चे मन से माफ़ी मांग लो, तो ख़ुदा का दिल भी पिघल जाता है
लेकिन कहने को तो वो ये भी कहती थीं कि अच्छा कर्म करो
तो फल बुरा हो ही नहीं सकता
फिर क्यूँ ऐसा हुआ कि दुनिया को खुश करने वाला
कल चिता पर लेटा था
और पूछनहारों कि क़तार में कितने मगरमच्छ खड़े थे
ये भी वो ऊपरवाला ही जानता होगा
अगर उसकी आँख फिर न लग गई हो तो...
ख़ैर, ये सब बातें भूलिए साहब, इनमें रखा क्या है
इंसान की फ़ितरत तो सिर्फ़ इतनी है
कि जो सामने होता है, ध्यान उसपर आ जाता है
जो गया, वो कितने वक़्त तक दिमाग़ में घर बनाये रह सकता है बेचारा?
कुछ आंसू बहेंगे,
उस सोते हुए ख़ुदा को कुछ लोग कोसेंगे...
ज़िन्दगी चलती जायेगी
आखिरकार
साँस लेना एक ऐसी लत है जो छूटे नहीं छूटती
जो छोड़ पाया, उसे क्यूँ न ख़ुदा बुला लें?"
They make it so easy in the moviesWith the background music, the parting shotAnd the walk awayIf only you, cinema, could be pennedBy the hand of one that is greater than usHow incoherent would you be?This is the way the world endsBurns out, doesn't fade awayOne moment is frolic, grins and teethAnother, a flickering candleTo be put out, with a huff of breathAnd leave just the faint aroma of burning wax behindYet, as you walk awayLight up your cigarette and remember the timesYou shared your lives, like those stubs withinEach needs to be put outBut leaves the ashes behindTo be scattered on the drain tomorrow morningAnd then, within the losing causeComes the phase when its rendezvous againThere is no painReally, none at all"Iron entered his hitherto kindly soul"It was a long pointy swordAnd so the Phoenix falls againMortally wounded, and unlikely to returnYet rebirth is inevitableBurn brighter, O golden one!It is you who will turn the diamond-studded blackness greyThis is your chance to shine, shine on!Burial at seaBeneath an epitaphOn a tower of silenceOr just a gift to the flamesAnd time for all the greensTo ignite their fragile selvesAnd leave the residue behindYellow.
आप सबको मेरी ओर से दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ...
प्रार्थना करूँगा की लक्ष्मी-गणेश सदा आप पर आशीर्वाद बनाये रखें, आपके जीवन में खुशियों का प्रकाश फैले...
और ये मेरे लिए...
रौशन था जो एक दिया जहाँ में, हवा से बाज़ी हार गया
पटाखों की गड़गड़ाहट के बीच उसे दफ़नाने की बारी है
रात कमरे में घुसकर खुशियों का गला घोट गई
यही अमावस की रात शायद कलयुग की दीवाली है...
For a believer to be together with an Agnostic is a pretty tough ask... Picture this: SOMETHING, ANYTHING goes wrong...Believer: Have faith in God, my dear, he'll make things rightorFate follows a Sine Curve, love. You've hit rock bottom, the only way to go is up...Agnostic: Yeah right, who created that trouble in the first place? YOUR GOD!orFuck your trigonometry... I hate this GOD who's such a SADIST that he can't get enough of fucking up everyone's happiness...Now what does the believer do? Agree with him/her and lose her/his own faith in God? Wait till the storm passes over and things return to normalcy?This is EXACTLY when Gulzar comes in handy... At least, he did for me...ख़ुदा - ४
पूरे का पूरा आकाश घुमाकर बाज़ी देखी मैंने--
काले घर में सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया
तुमने एक समन्दर हाथ में लेकर, मुझ पर ढेल दिया
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया
मेरी खुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया--
मौत की शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खो़ल उतार के सौंप दिया--और रूह बचा ली
पूरे का पूरा आकाश घुमाकर अब तुम देखो बाज़ी
चैन तो धरती छोड़कर भी नहीं मिलता ना...अब किसने ये सोचा था कि परलोक में भी कस्टम अफ़सर मिल जायेंगे?सूटकेस तो छोड़ के आना था प्लेटफार्म पर, लेकिन आख़िरकार उसे पीछे नहीं छोड़ पाया मैं...क्या करता, कुछ क़ीमती चीज़ें अब भी बाकी थीं उसमें...पर इन कमबख्तों ने उन्ही पर आब्जेक्शन लगा दिया!एक टी-शर्ट मिली, कुछ पसीने से महकी हुईएक लाल रंग का तौलिया, जिसमें से नमी गायब नहीं हुई थी अब तकसिगरेट का एक आधा-अधूरा सा पैकेटबस के दो टिकटसब माया की निशानियाँ थीं, जो उसे वापस करनी थीं...एक कलश मिला, मामा की अस्थियों कामाँ के आँसुओं से भीगा एक कुरता मिलाडब्बा भरकर गंगाजल भी था, अपने तर्पण से चुराया हुआ...ये सब चल जाता...लेकिन उस सूटकेस में कुछ किरचें भी बरामद हुईंतेज़, नुकीली किरचेंजो कभी ज़बान पर आकर अटक जाया करती थींकभी गले में खरोंचें मारती चलती थीं...किरचें कुछ अधूरी नज़्मों, कुछ टूटे ख़्वाबों कीइसीलिए शायद मुझे इस 'परगेटरी' में रखा गया है...खुदा के फैसले के इन्तेज़ार में...हवलदार मुझे लेकर जा रहा है कोर्टरूम...और सामने भूरे रंग का शौल लपेटे उस न्यायमूर्ति ने ठोक-बजाकरफ़ैसला कर ही लिया...एक महीना हुआ नहीं जन्नत की दहलीज़ पार किए,और फ़रमान सुना दिया उसने दोज़ख में पहुंचाने का...क्या उसे भी जीना माया ने ही सिखलाया था?जानता है वो की माया ने मुझे देख लिया तो उसका पत्ता कट जाएगाजलता है वो मुझसे...